नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने खुरई विधायक एवं पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह की ओर से दायर मानहानि संबंधी मामले में अंतरिम राहत देते हुए कुछ सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियो हटाने का आदेश दिया है। मामला CS(OS) 479/2026 में भूपेंद्र सिंह बनाम अभिषेक जैन एवं अन्य का है। आदेश 26 मई 2026 को न्यायमूर्ति विकास महाजन की अदालत ने पारित किया।
भूपेंद्र सिंह की ओर से आरोप लगाया गया था कि कुछ लोगों द्वारा सोशल मीडिया, YouTube और Facebook के माध्यम से उनके खिलाफ झूठे, दुर्भावनापूर्ण और भ्रामक आरोपों का अभियान चलाया गया। याचिका में उन्हें कथित तौर पर तानाशाह बताने, अवैध शराब कारोबार और कई हत्याओं से जोड़ने जैसे आरोपों का उल्लेख किया गया था।
कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद कई वीडियो, पोस्ट और लेखों को प्रथम दृष्टया देखा और कहा कि इनमें से कई सामग्री वादी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने तथा मामले को सनसनीखेज बनाने का प्रयास करती प्रतीत होती है। कोर्ट ने एक वीडियो का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें तीन दलित व्यक्तियों की मौत के मामले से भूपेंद्र सिंह को जोड़ने का प्रयास किया गया, जबकि उसी वीडियो में यह भी कहा गया था कि उन्हें घटना में आरोपी नहीं बनाया गया है।
अदालत ने एक अन्य इंटरव्यू का भी उल्लेख किया, जिसमें भूपेंद्र सिंह के खिलाफ गंभीर आरोप और धमकी दिए जाने की बात रिकॉर्ड में सामने आई। कोर्ट ने ऐसे आरोपों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेजी आधार, जैसे उनके खिलाफ संबंधित FIR, मौजूद न होने की बात भी नोट की।
कोर्ट ने मीडिया की स्वतंत्रता और व्यक्ति की प्रतिष्ठा के बीच संतुलन पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक हित के मामलों में मीडिया को रिपोर्टिंग की स्वतंत्रता है, लेकिन यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है। बिना सत्यापन के आरोपों को सनसनीखेज तरीके से प्रस्तुत करना और किसी व्यक्ति को न्यायिक निर्णय से पहले दोषी की तरह पेश करना 'Media Trial' की स्थिति पैदा कर सकता है।
अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि कुछ पोस्ट और वीडियो में अप्रमाणित दावों को सनसनीखेज बनाकर भूपेंद्र सिंह की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। इसके बाद प्रतिवादी नंबर 1, 2, 4 और 5 को अगली सुनवाई तक इसी तरह के या समान मानहानिकारक आरोप प्रकाशित करने से रोक दिया गया।
इसके साथ ही प्रतिवादी नंबर 1, 2 और 5 को आदेश में सूचीबद्ध Facebook और YouTube की 16 पोस्ट/वीडियो URLs हटाने का निर्देश दिया गया। यदि चार सप्ताह में सामग्री नहीं हटाई जाती है, तो वादी Google और Meta से संपर्क कर सकता है और आदेश के अनुसार संबंधित URLs को तीन कार्य दिवस के भीतर हटाने की प्रक्रिया की जा सकती है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह अंतरिम आदेश है, अंतिम फैसला नहीं। मुकदमे में प्रतिवादियों को अपना लिखित जवाब दाखिल करने और अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा।
ब्यूरो रिपोर्ट - 'द प्राइम एक्सप्रेस'
संवाददाता - अर्पित सेन
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