सागर। जिला मुख्यालय में आयोजित जनसुनवाई में मंगलवार को उल्दन बांध परियोजना से प्रभावित एक 70 वर्षीय जन्मांध किसान की दर्दभरी कहानी सामने आई। किसान लोखन सिंह लोधी ने प्रशासन के सामने गुहार लगाते हुए बताया कि उनकी लगभग तीन एकड़ कृषि भूमि उल्दन बांध परियोजना के डूब क्षेत्र में चली गई, लेकिन आज तक उन्हें मुआवजा नहीं मिल सका।
पीड़ित किसान के अनुसार, समस्या केवल नाम के अंतर की है। भूमि संबंधी अभिलेखों और अन्य दस्तावेजों में उनका नाम "लोखन सिंह लोधी" दर्ज है, जबकि आधार कार्ड में "लोकमान सिंह लोधी" लिखा हुआ है। इसी विसंगति के कारण उनकी मुआवजा राशि लंबित है। हैरानी की बात यह है कि इसी आधार कार्ड पर उन्हें प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि और मुख्यमंत्री किसान सम्मान निधि जैसी अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ लगातार मिल रहा है, लेकिन उल्दन बांध परियोजना का मुआवजा अब तक जारी नहीं हुआ।
जन्म से दृष्टिबाधित किसान ने बताया कि पिछले एक वर्ष से वह लगातार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं। आंखों से दिखाई नहीं देने के कारण उन्हें हर बार किसी रिश्तेदार या किराए पर व्यक्ति को साथ लेकर आना पड़ता है। परिवार में उनकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं है, जिससे हर बार प्रशासन तक पहुंचना उनके लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। जनसुनवाई में अपनी व्यथा सुनाते-सुनाते किसान भावुक हो गए।
यह मामला प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जब अन्य सरकारी योजनाओं में इसी व्यक्ति की पहचान स्वीकार कर लाभ दिया जा रहा है, तो आखिर बांध परियोजना के मुआवजे में नाम की तकनीकी त्रुटि इतनी बड़ी बाधा क्यों बन गई? क्या एक जन्मांध किसान को सिर्फ कागजी विसंगति के कारण उसके वैधानिक अधिकार से वंचित रखना उचित है?
अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं। देखना होगा कि क्या इस पीड़ित किसान को उसका हक दिलाने के लिए तत्काल समाधान निकाला जाता है या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों में उलझकर रह जाएगा।
ब्यूरो रिपोर्ट "द प्राइम एक्सप्रेस"
संवाददाता — अर्पित सेन
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