सरकार की 'सुगम परिवहन सेवा योजना' बनाम बस ऑपरेटरों का विरोध... आखिर किसकी जीत होगी और किसकी हार....?



सबसे बड़ा सवाल—क्या इसकी कीमत प्रदेश की जनता चुकाएगी....?

मध्य प्रदेश में सार्वजनिक परिवहन को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने 'मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा योजना' लागू करने का फैसला किया है। इस योजना के तहत प्रदेश के सात परिवहन क्षेत्रों में पांच हजार दो सौ से अधिक आधुनिक सरकारी बसें पीपीपी मॉडल पर संचालित की जाएंगी। बसों में जीपीएस ट्रैकिंग, डिजिटल टिकटिंग जैसी सुविधाएं होंगी और कई अंतरराज्यीय मार्गों को भी जोड़ा जाएगा। सरकार का दावा है कि इससे यात्रियों को सुरक्षित, सुविधाजनक और तकनीक से जुड़ी बेहतर परिवहन व्यवस्था मिलेगी।

लेकिन सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के सामने अब सबसे बड़ा विरोध खड़ा हो गया है।




मध्य प्रदेश बस ऑनर्स एसोसिएशन ने इस नई परिवहन नीति को "दमनकारी" बताते हुए खुला विरोध शुरू कर दिया है। बस संचालकों का कहना है कि यह योजना निजी बस व्यवसाय को खत्म करने की दिशा में उठाया गया कदम है। उनका आरोप है कि सरकारी बसों की वापसी से हजारों निजी बस मालिक, ड्राइवर, कंडक्टर और परिवहन से जुड़े कर्मचारी बेरोजगारी की ओर धकेले जाएंगे।

बस ऑपरेटरों ने सरकार के सामने सात प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें नई परिवहन स्कीम को तत्काल वापस लेने, बस किराए में बढ़ोतरी, जारी टेंडर निरस्त करने, तैयार खड़ी बसों का पंजीयन, पुरानी बसों पर कार्रवाई रोकने, 15 वर्ष की आयु सीमा समाप्त करने और अंतरराज्यीय परमिटों के नवीनीकरण जैसी मांगें शामिल हैं।

बस एसोसिएशन ने साफ चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो 7 अगस्त 2026 की रात 12 बजे से पूरे प्रदेश में अनिश्चितकालीन बस हड़ताल शुरू कर दी जाएगी।



यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है...

एक तरफ सरकार यात्रियों के लिए आधुनिक परिवहन व्यवस्था देने की बात कर रही है, तो दूसरी तरफ निजी बस संचालक अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने का दावा कर रहे हैं। लेकिन इन दोनों के बीच सबसे ज्यादा परेशानी आखिर किसे होगी?

जवाब साफ है—प्रदेश की आम जनता को।

रक्षाबंधन जैसे बड़े त्योहार का समय नजदीक है। हर साल लाखों लोग अपने घर जाने के लिए बसों पर निर्भर रहते हैं। यदि इस दौरान बसों का संचालन बंद होता है तो यात्रियों को भारी परेशानी, किराए में मनमानी और वैकल्पिक साधनों की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

अब कुछ ऐसे सवाल भी हैं जिनका जवाब सरकार और बस ऑपरेटर—दोनों को देना होगा।

यदि सरकार नई परिवहन नीति ला रही थी, तो क्या इससे पहले बस ऑपरेटरों, परिवहन विभाग और संबंधित पक्षों के साथ पर्याप्त संवाद हुआ था? यदि हुआ था, तो फिर इतना बड़ा विरोध आखिर क्यों सामने आया?

और दूसरी तरफ...

क्या बस ऑपरेटरों के लिए जनता को परेशानी में डालकर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाना उचित है? क्या यात्रियों को बंधक बनाकर अपनी मांगें मनवाना लोकतांत्रिक तरीका माना जा सकता है?

इसी तरह किराया बढ़ाने की मांग भी बहस का विषय है। डीजल, टायर और स्पेयर पार्ट्स की कीमतें बढ़ने की बात अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन क्या अचानक किराए में वृद्धि का पूरा बोझ सीधे यात्रियों पर डाल देना उचित होगा? इसका संतुलित समाधान निकालना भी सरकार और परिवहन विभाग की जिम्मेदारी है।



फिलहाल प्रदेश में सरकार और बस ऑपरेटर आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। लेकिन इस टकराव में सबसे बड़ी चिंता उस आम यात्री की है, जिसे रोज़ सफर करना है, समय पर अपने गंतव्य तक पहुंचना है और त्योहार पर अपने परिवार के बीच भी जाना है।

अब निगाहें सरकार और बस एसोसिएशन के बीच होने वाली अगली बातचीत पर टिकी हैं। क्या सरकार बस ऑपरेटरों की मांगों पर विचार करेगी? या फिर बस एसोसिएशन अपनी हड़ताल के फैसले पर अडिग रहेगा?

क्योंकि यदि समाधान समय रहते नहीं निकला... तो सबसे बड़ा नुकसान किसी सरकार या बस मालिक का नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की करोड़ों जनता का होगा।


ब्यूरो रिपोर्ट "द प्राइम एक्सप्रेस"

संवाददाता — अर्पित सेन 

7806077338

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